जलाने में चिरागों को उँगलियाँ भी जल जाया करते हैं
मौसम बहारों की आने में, बस्ती भी उजड़ जाया करते हैं
पानी की बूंदे जो बिखरे है पत्तों पर, खाक मे मिल जाया करते हैं
किस्मत हमारी कभी एसी न थी, जो गिर के सीप में मोती बन जाया करते हैं
बने जो आसमानों की बिजली, तो रात जलाया करते हैं
रहे न रहे हमारी बस्ती, गुल बाग़ सजाया करते है
कौन है राम, में रहीम न जानू , मेहमान बुलाया करते है
राह कौन सी मंजिल कैसी, हर राह सजाया करते है
रुकी साँस जो बाकि है, भगवन बुलाया करते है
ख़त्म हो गई सांसे अब तो, कफन सजाया करते है
जलाने में चिरागों को उँगलियाँ भी जल जाया करते हैं
मौसम बहारों की आने में, बस्ती भी उजड़ जाया करते हैं
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