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Apr 22, 2009
अपनी गज़ले गाता हूँ, दर्द कोई जब पता हूँ,
अपनी गज़ले गाता हूँ, दर्द कोई जब पता हूँ,
मौत से प्रीत लगाई मैने, अपनी कॅफ्न सजाई मैने,
बात छिड़ी थी खुशियों की, पर आँख मे अस्क को पाता हूँ,
अपनी गज़ले गाता हूँ, दर्द कोई जब पता हूँ........
सहेर की जज़मे गाने वाले सेहरा के ख़ौफ़ को भी जानो,
सहेर की इस सुंदर पहलू मे, सांम का साया पाता हूँ,
अपनी गज़ले गाता हूँ, दर्द कोई जब पता हूँ.........
गर्म हवाएँ बहती है, जिस्म जालाया करती हैं,
जल उठा है सारा मंज़र, बर्फ बना है आग का पत्थर, मई घर को जालाए जाता हूँ,
अपनी गज़ले गाता हूँ, दर्द कोई जब पता हूँ.........
मेरी मौत का मंज़र कैसा हो, खूनी बादल फैला हो,
बहुत जल चुका मई जीते जी, अब दफ़्न की आश् जागता हूँ,
अपनी गज़ले गाता हूँ, दर्द कोई जब पता हूँ.........
जीवन की इस अंतिम संध्या पर, इच्छा उभरी मेरे आधारों पर,
जीवन की इस अंतिम यात्रा मे, जन गड़ मन की पावन धुन में, कोई गीत पुराने गाता हूँ,
अपनी गज़ले गाता हूँ, दर्द कोई जब पता हूँ.........
फिर मई सायर मर नही पाउँगा, मर कर आग लगाउँगा,
राम-रहींम के इस दुनियाँ मे सायर पूजे जाता हूँ,
अपनी गज़ले गाता हूँ, दर्द कोई जब पता हूँ.........
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