Apr 20, 2009

क्या तुम्हें हम भी कभी याद नही आते है


क्या तुम्हें हम भी कभी याद नही आते है
सुर्ख मौशम मे भी बर्षात का लुफ्ट उठाते है
कह दो मौसम के खुश फिजाओं से ज़रा, चल के आखों से मेरे क्यूँ ना छलक जाते हैं
क्या तुम्हें हम भी कभी याद नही आते है...........................................

है ये कैसा जमाने का चलन,
कैसी यादो का चुभन,
बन के आपना सा कोई क्यूँ दूर तलाक़ जाते हैं,
क्या तुम्हें हम भी कभी याद नही आते है...........................................

है लहू आँख मे पानी ही नही,
पूरे मौसम रहेगी जवानी ही नही,
सूखे दरिया से क्यूँ प्यास बुझते हैं,
क्या तुम्हें हम भी कभी याद नही आते है...........................................

वक़्त ज़रा थम के तू चल,
चाल तेरी तेज ना कर,
अब तो दामन मे सेहरा ही नज़र आते हैं,
क्या तुम्हें हम भी कभी याद नही आते है...........................................

रंग है रात का क्या, कैसी सुबह होती है,
मेरे यादों में कभी,क्या आँख तेरी सोती है,

मैने सदियो से तुझे पलको पे सजाए रखा,
सारे दुख दर्द को सिने से लगाए रखा,

मेरे जागीर हो तुम, मेरी जवानी तुम हो,
मेरे सेहरा मे खिले फूल गुलाबी तुम हो,

तुम से मिलने को तूफ़ा से भी टकराते है,
क्या तुम्हें हम भी कभी याद नही आते है...........................................




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