एक मई हूँ की, चरागे सांम जला रक्खी है,
और वो है की, फिर से हवा को हवा दी है,,
कुछ भी हो चराग़ न बुझने देंगे,
और फिर रात को न रात रहने देंगे,,
आज तूने फिर से, ये कैसी सज़ा दी है,
एक मई हू की,.................
अब जहर पी है तो फिर मरने का भ्रम क्यूँ टूटे,
जीने की सज़ा पाई है मैने, अब तो मर के ही उसका संग छूटे,,
दोस्त वो ना रहा अब मेरा, ये अस्क आखों मे उसी ने तो दी है,
एक मई हू की,..................
मेरे हम सफ़र, मेरे राह गुजर, मेरी जिंदगी की दुआ न कर,
जख्म दिल पे ना रह जाएगा, बस कुछ दूर मेरे साथ चल,
ये चराग़ आज ही बुझ जाएगी, जिसे हमने सदियो से जला रखी है,,
एक मई हू की,..................
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