Dec 12, 2010

फूलों से ये कैसी नाराज़गी


फूलों से ये कैसी नाराज़गी
आ झूलों पे झूले ओ जिंदगी

पतंग उड़ाता आदमी
नभ पर खाक छानता आदमी

सड़क पर उड़ती धूल
अपरचित अदृश्य त्रिशूल

रहने दो, छोड़ो अब जीने की आश्
खिचने दो लकीर चेहरे पर, जैसे प्यासे की तास

झूठी उम्मीद, झूठी तसल्ली
अनुराग हमने ये किससे कर ली

मेरा उड़ना, क्या उड़ाना
अंत मे बस खाक पाना

रक्त बोली मई न गरदिस कर सकूँगी
संग तेरे दिन- रात यूँ ना चल सकूँगी

सूखे पत्ते तू खाक मे मिल जाएगा
रात तेरा अंत ही तो उजाला लाएगा

गा के देखो गीत कोई प्रेम के
बन के देखो, फूल कोई रेत के

आओ अनुराग प्रणय मे बधे हम
अब तो प्रीत करेंगे सब से हम

मंज़िल कहाँ अब दूर, वो पास होगी
कर्म कर तू अपना, फिर न रात होगी

फिर न कोई कली, अधखिली मुरझाएगी
साधानो की दौर मे वो सड़क किनारे भूख, भूखा न सो पायेगी

दर्द न फिर आहे भरेगा
रंक न दूर तक रहेगा

मई चालू, तुम चलो, तुम भी चलो
साथ अपने सत्य, समर्पण फिर राग लेलो

फिर वो कहाँ से ? बुझती किरण है आ रही
दर्द बीता है जो उसपे वो गा रही

वो दीप जो जला था, रात मे दिन के लिए
हम ना बुझने देंगे, अब मेरे प्रिये

हर बुझते दिये के हम साथ हो जाएँगे
न कुछ कर सका तो, जाग रौशनी को दीप सा जल जाएँगे

फिर वक़्त एसा लाएँगे
हर डाल मे फूल ही फूल खिल जाएँगे..................................

5 comments:

  1. the way u discribe ds poen,luk like u discribe d problem of every person,
    in this a man journey is strated wd problms and end wd problems.
    this poem give a positive energy to every human benig.it is awsom

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  2. nice one baba.......
    continue with gr8 poems.......

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  3. kya baat hai baba..........
    This is awsom..............
    continue.........

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