सुना है झील सी है आखे उसकी,
आज उसमे डूब के देखते है,,
सुना है बात करती है आईने से वो,
आज उसकी रूह मे उतर के देखते है,,
सुना है वो अजन्नताए मूरत है,
हम जल ना जाए ये सोच के जलते है,,
उसका रुकना जैसे वक़्त का रुकना,
और चले तो जमाना रुक के देखते है,,
मेरा नसीब ना था की उसको देखु,
हम तो खुद मे उसको देखते है,,
उसके वास्ते रुकु की मौत कर जाउ,
सायद वो खाब है, आज नीद से उठ के देखते है,,
सुना है झील सी है आखे उसकी,
आज उसमे डूब के देखते है,,
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