Apr 14, 2009

मेरे बस्ती का अजीब था रिवाज

मेरे बस्ती का अजीब था रिवाज, मे चिराग नही ,था फ़िर भी जलाया गया
मतकर आसमा छूने की बात, उठने से पहले ही जमीं पे लाया गया ,,

मेरे लिया कौन मासिह आएगा, जो जमीं से हटकर जगह बनाएगा

खाक से दोस्ती रही है बचपन से, क्या वो ही मेरा राह गुजर बन जाएगा ,,

अब तो नींद आने लगा है मेरे ख्वाबो को, क्या ख्याब भी सेहरा सा बिरान हो जायेगा

मेरे बस्ती का अजीब था रिवाज , मे चिराग नही था, फ़िर भी जलाया गया ,,
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1 comment:

  1. Lag raha hai kavi ne apne dil ke sare jajbat ko baya kar diya hai, Girish apse sirf yahi kahuga:-
    "Yeh Smagh Lein Gey Hamari Ab kOii Manzil Nahi
    Phir Sey Gar Jeena Para HAmein Zamanay K Leye "
    Thanks for nice Poetry
    Keep up writing

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