Dec 12, 2010

मानो जैसे दूर छितिज पर कोई भेष बदल कर आया है


आती धूप दूर चाँद पर
धरती पर अधियारा है,
मानो जैसे दूर छितिज पर कोई भेष बदल कर आया है,,

सूरज सोया, रात जाग गयी
किरणे सोई, क्या बात हो गयी
चारो तरफ धुन्न्ध छा रहा, जो हर दिल को दहलाया है,
मानो जैसे दूर छितिज पर कोई भेष बदल कर आया है,,

टीम- टीम तारें जाग गये है,
क्या खुशियाँ सूरज साथ गये हैं
तुम सो जाओ, मई भी सो जाउ, जो निशचरी रत आया है,
मानो जैसे दूर छितिज पर कोई भेष बदल कर आया है,,

कौन सुने अब मेरी बात
फैला चारो ओर है रात
वो भी नज़रे फेर गया है, जो मेरी खुशियों का साया है,
मानो जैसे दूर छितिज पर कोई भेष बदल कर आया है,,

वो देखो- तारों की बारात आ गयी
सायद उनको रात भा गयी
मेरे इस बिचलित अवसर पर, वो भी बना तमासाया है,
मानो जैसे दूर छितिज पर कोई भेष बदल कर आया है,,

4 comments:

  1. बहुत सुंदर लयबद्ध कविता.

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  2. realy amaging post dude!!!!.............keep it up!!!!!!!!

    :)

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  3. maza aa gaya ...........
    very niceeeeeeeeee......

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  4. kya baat hai ...........
    very nice...........

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